पद्मश्री छुटनी देवी जी का जीवन परिचय

पद्मश्री छुटनी देवी जी का जीवन परिचय : एक ऐसी ‘वीरांगना’ जिन्होंने पूरे झारखंड में डायन-भूतनी कहकर प्रताड़ित की गई महिलाओं को नरक जैसी जिंदगी से बाहर निकाला है। डायन बताकर जिनपर हुए बेहिसाब जुल्म, उनकी मुहिम से 500 महिलाओं को मिली नई जिंदगी। झारखंड के सरायकेला-खरसांवा जिले के बीरबांस गांव की रहनेवाली है छुटनी देवी। जो देश के राष्ट्रपति के हाथों 9 नवंबर 2021 को पद्मश्री से सम्मानित हुयी।

पद्मश्री छुटनी देवी जी का जीवन परिचय

पद्मश्री छुटनी देवी जी को ही इन्टरनेट पर लोग छुटनी महतो के नाम से जान रहे हैं। ऐसा गलती से हुआ। छुटनी देवी झारखंड के जिला सरायकेला-खरसांवा के गम्हरिया में बीरबांस इलाके की रहने वाली महिला है। 12 वर्ष की उम्र में उनकी शादी गम्हरिया थाना के महातांड डीह गांव के धनंजय महतो से हुई। इनके 3 बच्चे हैं।

छुटनी देवी बताती हैं कि 3 सितंबर 1995 को घटी घटना के बाद आज इस जगह तक पहुंचने के लिए उन्होंने बेहिसाब दुःख झेली हैं।जब भी वो पुराने दिनों को याद करती हैं तो रोंगटे खड़े हो जाते हैं। वो बताती हैं कि, “3 सितंबर की घटना के बाद मेरा ससुराल में रहना मुश्किल हो गया। यहां तक कि पति ने भी साथ छोड़ दिया, मेरे तीन बच्चे हैं। तीनों को साथ लेकर आधी रात को गांव से निकल गई। एक रिश्तेदार के यहां रुकी, पर यहां भी उन्हें डायन करार देने वाले लोगों से खतरा था। वो उफनती हुई खरकई नदी पार कर किसी तरह आदित्यपुर में अपने भाई के घर पहुंचीं, लेकिन बदकिस्मती ने यहां भी पीछा नहीं छोड़ा। कुछ रोज बाद मां की मौत हो गई और तो मुझे यह घर भी छोड़ना पड़ा। फिर, गांव के ही बाहर एक पेड़ के नीचे झोपड़ी बनाकर सिर छिपाने का इंतजाम किया। 8-10 महीने तक मेहनत-मजदूरी करके किसी तरह अपना और बच्चों का पेट भरती रही.”

1995 में क्या हुआ था, छुटनी देवी के साथ

छुटनी देवी (Chutni Devi) को आज भी 3 सितंबर 1995 की तारीख अच्छी तरह याद है। इस दिन गांव में बैठी पंचायत ने उन पर जो जुल्म किए थे, उसकी टीस आज भी जब उनके सीने में उठती है तो जख्म एक बार फिर हरे हो जाते हैं। उनकी आंखों से आंसू गिरने लगते हैं। पड़ोसी की बेटी बीमार पड़ी थी और इसका जुर्म उनके माथे पर मढ़ा गया था, ये कहते हुए कि तुम डायन (Dayan) हो। जादू-टोना करके बच्ची की जान लेना चाहती हो।

साल 2016 में छुटनी देवी ने बीबीसी को अपनी कहानी बताई थी। मेरे पड़ोसी भोजहरी की बेटी बीमार हुई।लोगों ने शक जताया कि मैंने उस पर टोना कर दिया है। गाँव में पंचायत हुई। इसमें मुझे डायन क़रार दिया गया।लोगों ने घर में घुसकर मेरे साथ बलात्कार की कोशिश की। वे लोग दरवाज़ा तोड़कर अंदर आए थे। हम किसी तरह बचे। सुंदर होना मेरे लिए अभिशाप बन गया।

पंचायत ने उनपर 500 रुपये का जुमार्ना भी लगाया था। दबंगों के खौफ से छुटनी देवी ने जुमार्ना भर दिया लेकिन बीमार बच्ची अगले रोज भी ठीक नहीं हुई तो 4 सितंबर को एक साथ 20-30 लोगों ने उनके घर पर धावा बोल दिया। उन्हें खींचकर बाहर निकाला, उनके तन से कपड़े खींच लिए गए, बेरहमी से पीटा गया।

इतना ही नहीं, बीमार बच्ची को ठीक करने के लिए ओझा गुणी बुलाया गया तो उन्होंने मानव मूत्र पिलाने की बात कही, जिससे डायन का प्रकोप उतर जाएगा। ऐसे नहीं करने पर उनपर मल-मूत्र तक फेंका गया। उसके बाद से उन्हें गाँव के बाहर कर दिया।

छुटनी देवी से पद्म श्री छुटनी महतो बनने की कहानी

छुटनी देवी के इलाके की एक बड़ी शख्सियत बनने की एक शानदार दास्तां है। साल था 1996-97 का, छुटनी देवी की मुलाकात फ्रीलीगलएड कमेटी (फ्लैक) के कुछ सदस्यों से हुई। फिर, उनकी कहानी जब मीडिया में आई तो बात हवा के तरह फैल गई। नेशनल जियोग्राफिक चैनल तक बात पहुंची तो उनके जीवन और संघर्ष पर एकडाक्यूमेंट्री बनी।

2000 में गैर सरकारी संगठन एसोसिएशन फॉरसोशल एंड ह्यूमन अवेयरनेस (आशा) ने उन्हें समाज परिवर्तन और अंधविश्वास के खिलाफ अभियान से जोड़ा। उन्होंने यहां रहकर समझा कि कानून की मदद से कैसे अंधविश्वासों से लड़ा जा सकता है।

सामाजिक जागरूकता के तौर-तरीके समझे। फिर, हर उस गांव में जाती जहां किसी को डायन-ओझा कहकर प्रताड़ित करने की शिकायत मिलती थी। गांव वालों को समझाने की कोशिश करती। जुल्म झेल रहीं डेढ़ सौ से ज्यादा महिलाओं को अपने साथ जोड़ा। धमकियां भी मिलीं, पर उन्होंने अब किसी की परवाह नहीं की। एनजीओ के जरिए रेस्क्यू की गई महिलाओं को स्वरोजगार के साधनों से जोड़ा गया।

सिलाई-बुनाई, हस्तकला, शिल्पकला और दूसरे काम की ट्रेनिंग दी गई। बीरबांस में ही आशा का पुनर्वास सह परामर्श केंद्र बनाया गया, जो पीड़ित महिलाओं के लिए आश्रय गृह है। छुटनी देवी की मदद से अब तक 500 से भी अधिक महिलाओं की जिंदगी में नई रोशनी आ चुकी है ..और यह मुहिम अभी भी जारी है।

डायन के नाम पर हत्या के आकड़े

झारखंड में पिछले 20 साल में क़रीब 16 सौ महिलाएँ डायन के नाम पर मारी जा चुकी हैं। एसोसिएशन फार सोशल एंड ह्यूमन अवेयरनेस (आशा) के अजय कुमार जायसवाल के अनुसार झारखंड में 2016 में 18 महिलाओं की हत्या डायन होने के आरोप में कर दी गई थी।

पद्मश्री छुटनी देवी जी का जीवन परिचय (Biography of Padmashree Chutni Devi )
BBC

नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के 2014 में आँकड़े के मुताबिक़ झारखंड में 2012 से 2014 के बीच 127 महिलाओं की हत्या डायन बताकर कर दी गई।

राज्यसभा में एक सवाल के जवाब में तत्कालीन गृह राज्यमंत्री एचपी चौधरी ने ये आँकड़े बताए थे। उन्होंने कहा था कि झारखंड में 2014 में ही 47 महिलाओं की हत्या डायन बताकर कर दी गई। यह उस साल देशभर में डायन के नाम पर हुई हत्याओं का 30 फ़ीसदी था।

राष्ट्रपति ने किया पद्म श्री से सम्मानित

झारखंड को डायन नामक कलंक से मुक्ति दिलाने का बीड़ा जिन चंद संस्थाओं और लोगों ने उठाया है, उनमें छुटनी देवी का नाम सबसे ऊपर है। यह वही छुटनी हैं, जिन्हें समाज के लोगों ने डायन बता प्रताड़ित किया था। मुश्किल घड़ी में न तो गांव का साथ मिला और न ही समाज का। और तो और सात जन्मों तक साथ निभाने की कसमें खाने वाले पति ने भी उन्हें छोड़ दिया। एक दौर ऐसा भी आया जब खुद की और अपने तीन बच्चों की जान बचाने के लिए छुटनी देवी को आधी रात सरायकेला में बहने वाली खरकई (पहाड़ी नदी) पार करनी पड़ी। वहीं आठ महीने तक पेड़ के नीचे बनी टाट की झोपड़ी में दिन काटने पड़े। तब न तो उन्हें पुलिस का सहयोग मिला और न ही जन प्रतिनिधियों का।

समाज से मिली इस पीड़ा ने आज छुटनी देवी को इतना ताकतवर बना दिया कि वह हजारों महिलाओं की आवाज बन गईं। झारखंड के सरायकेला विधानसभा क्षेत्र स्थित बीरबांस गांव में रहने वाली छुटनी देवी का नाम आज छत्तीसगढ़, बिहार, बंगाल और ओडिशा के सीमावर्ती इलाकों में डायन कहकर प्रताड़ित की जानेवाली हर महिला की जुबान पर है। ऐसी महिलाओं का संबल बनीं छुटनी देवी गांव, समाज, थाना से लेकर कोर्ट तक डायन बताई गई महिलाओं की न्याय की लड़ाई लड़ रही हैं। वे सबको न्याय दिलाना चाहती हैं।

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Conclusion : Biography of Padmashree Chutni Devi

एक समय हुआ करता था जब पद्म पुरस्कार पाने वालों के नाम मैं कभी देखना और सुनना नही चाहता था पढ़ना तो दूर की बात……हाँ एक प्रतियोगी छात्र होने के नाते रटना जरूर पड़ता था ।
लेकिन इस नए भारत की इस नई लिस्ट को पढ़कर मन प्रसन्न और उत्साहित हो उठता है।

व्यक्तिगत रूप से मेरा तो यही मानना है की देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान समाज या किसी सेवा विशेष के टॉप पर पहुंचे हुए लोगों को न देकर डाउनटू अर्थ अर्थात जमीन से जुड़े हुए लोगों को दिए जाएं।

एक चीज याद रखना दोस्तों जिस दिन इस देश में महंगे आभूषणों परिधानों चमचमाती गाड़ियों और आलीशान भवनों में रहने वालों अर्थात विलासितापूर्ण जीवन जीने वालों से छीन कर देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान धोती कुर्ता, साधारण सी साड़ी और टूटी फूटी चप्पल पहनने वालो के हाथों में देकर उनका मां सम्मान और गौरव बढ़ाया जाए तो इतना समझ जाना कि देश सुरक्षित हाथों में है।

दोस्तों ऐसे वीरांगना, पद्म श्री छुटनी देवी जी के लिए एक आपका Comment तो जरूर बनता है। Comment box में अपना प्यार दें।

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